अब तो टेंडर की आड़ खूब चीरेंगे बेतवा का सीना

 

नेता, अफसर, पट्टाधारक गठजोड़ फिर बनने के आसार

मौरंग खनन माफिया मन ही मन खुश

वैद्य खनन करके छह महीने में कैसे निकाल पाएंगे दो लाख 20 हजार घनमीटर बालू

पथरेहटा घाट में खनन के लिए हुआ टेंडर चर्चा का विषय

टेंडर के हिसाब से जिले में अवैध खनन पिछली सरकार से भी अधिक होने की संभावना
मनोज शर्मा / हेमन्त चौरसिया

ऋषी न्यूज मुख्य संवाद |

विधानसभा चुनाव में अवैध खनन को मुद्दा बनाकर भारतीय जनता पार्टी ने भले ही जीत हासिल  कर भगवा सरकार बना ली हो, पर हकीकत यह है कि जिस तरह से खनन के लिए टेण्डर दिए गए हैं उस लिहाज से अवैध खनन होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता | पिछली सरकार में 50 एकड के पट्टे में डेढ लाख घनमीटर बालू निकालने की अनुमति मिलती थी। जबकि इस बार भाजपा  सरकार में हुए टेंडर में मात्र 22 एकड के पट्टे में छह माह में ही दो लाख घन मीटर से अधिक बालू निकालने की अनुमति सरकार द्वारा दी गई है। अब सवाल यह उठ रहा है कि वैद्य खनन कराकर इतने कम समय में इतनी अधिक बालू कैसे निकाल सकेंगे। इसलिए यह पूरी संभावना जताई जा रही है कि एक बार फिर से जिले में अवैध खनन का कारोबार पनप सकता है। हालांकि इस बारे में विभागीय अधिकारियों का कहना है कि किसी भी सूरत में अवैध खनन नहीं होने दिया जाएगा। अब देखना यह है कि विभागीय अधिकारियों का यह दावा पूर्व की तरह हवा-हवाई साबित होता है या फिर वाकई अवैध खनन को रोकने के लिए खनिज विभाग मानसिक रूप से तैयार हो पाएगा! नेता,अफसर और पट्टाधारक गठजोड़ योगी मंशा और बीजेपी चुनावी दावे भी निकल सकते है |
गौरतलब है कि जिले में बालू खनन के लिए विगत सप्ताह पथरेहटा घाट का टेंडर निकाला गया था। 15 करोड 64 लाख रुपए में यह टेंडर भोपाल की फर्म कॉमर्स एसोसिएट्स को दिया गया है। जो कि 22 एकड के पट्टे में बालू का खनन करेगी। इस टेंडर प्रक्रिया में खास बात यह है कि सरकार द्वारा 22 एकड के इस पट्टे में छह माह में दो लाख 20 हजार घनमीटर बालू खनन करने की अनुमति दे दी गई है। जबकि यह संभव नहीं है कि वैद्य तरीके से मजदूरों के माध्यम से खुदाई कराकर इतनी बालू छह महीने के अंदर निकाली जा सके। गौर करने वाली बात यह है कि इससे पूर्व सपा सरकार में वर्ष 2015 तक 50-50 एकड के पट्टे एक वर्ष के लिए हुए थे और इस 50 एकड के पट्टे से मात्र डेढ लाख घन मीटर बालू निकालने की अनुमति पर्यावरण मंत्रालय द्वारा दी गई थी। अगर पिछली सपा सरकार व वर्तमान की सरकार द्वारा दिए गए खनन के पट्टों की तुलना करें तो इस बार टेंडर में पहले की अपेक्षा नौ गुना से अधिक बालू उठाने की अनुमति सरकार द्वारा दे दी गई है। अब सवाल यह उठता है कि इतनी अधिक बालू मात्र छह महीने में मजदूरों के माध्यम से कैसे निकाली जा सकेगी? इससे जाहिर हो रहा है कि कहीं न कहीं अवैध तरीके से खनन करके नदियों का सीना चीरते हुए बालू निकाली जा सकती है। अगर ऐसा हुआ तो योगी सरकार भी पूर्व की सरकारों की तरह आरोपों में घिर जाएगी। हालांकि इस बारे में खनिज अधिकारी राजेश कुमार सिंह का कहना है कि टेंडर लेने वाली फर्म को छह महीने का समय दिया गया है। समय पूरा होने के बाद इसे आगे नहीं बढाया जाएगा। साथ ही यह भी निगाह रखी जाएगी कि संबंधित फर्म चिन्हित जगह के अलावा और कहीं से बालू न निकाले। किसी भी सूरत में अवैध खनन नहीं होने दिया जाएगा।
खनन टेंडर होने के बाद भी गरीबों की पहुंच से दूर रहेगी बालू

जिले में बालू खनन का टेंडर भले ही हो गया हो, पर यह बालू अभी भी गरीबों की पहुंच से  दूर रहेगी। कारण यह है कि पिछली  सपा सरकार में 150 रुपया प्रति घनमीटर बालू के हिसाब से रॉयल्टी बसूली जाती थी। अब योगी  सरकार में यह रॉयल्टी करीब पांच गुना बढा दी गई। अब यह  रॉयल्टी 716 रुपए प्रति घनमीटर के हिसाब से बसूली जा रही है। जब सरकार पट्टा धारक से पांच गुना अधिक रॉयल्टी बसूल कर रही है तो फिर पट्टाधारक इस बालू को बाजार में किस रेट में बेचेगा। जाहिर है कि जब रॉयल्टी पांच गुना बढ गई है तो बाजार में बालू के दाम भी कम से कम दस गुना से अधिक बढेंगे। ऐसे में बालू गरीबों की पहुंच से अभी भी दूर रहने वाली है। इन खनन पटटों का गरीबों को कोई लाभ नजर नहीं आ रहा हैै।
ढाई मीटर से अधिक हुई खुदाई तो डूब जाएंगे सैकडों गांव

हाल ही में हुए पथरेहटा घाट पर बालू खनन के  टेंडर में ढाई मीटर तक खुदाई करके बालू निकालने की अनुमति दी गई है। पर अब तक यह देखा गया है कि कभी भी नियमानुसार बालू की खुदाई नहीं हुई। ऐसे में अगर यही क्रम आगे भी जारी रहा और ढाई मीटर से अधिक खुदाई करके बालू निकाली गई तो इससे किसानों को बडा नुकसान होगा और सैकडों गांव पानी में डूबने की संभावनाएं बढ जाएगीं।
क्या एनओसी जारी होने से पहले होगी जनसुनवाई!

जिला प्रशासन द्वारा इतनी कम जगह से अत्याधिक बालू निकालने की अनुमति दिए जाने के बाद संबंधित क्षेत्र के किसानों की मुश्किलें और भी बढ सकती हैं। इससे किसानों की चिंताएं भी बढ गई हैं। गौरतलब है कि इससे पूर्व जब भी पर्यावरण मंत्रालय खनन की एनओजी जारी करता था उससे पूर्व जनसुनवाई की जाती थी और संबंधित क्षेत्र के किसानों की आशंकाओं के बारे में पूछा जाता था। इस बार भी इसी जनसुनवाई को लेकर किसानों की उम्मीदें टिकी हुई हैं। इस बारे में खजिन अधिकारी राजेश कुमार ंिसह का कहना है कि अगर पर्यावरण मंत्रालय चाहेगा तो एनओसी जारी करने से पूर्व जन सुनवाई कर सकता है। ⁠⁠⁠⁠

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